महाभारत की कहानी — एक संक्षिप्त परिचय
महाभारत भारतीय संस्कृति के सबसे महान ग्रंथों में से एक है। इसकी रचना का श्रेय महर्षि पराशर के पुत्र वेदव्यास को जाता है। कहा जाता है कि व्यास जी ने सबसे पहले यह कथा अपने पुत्र शुकदेव को कंठस्थ करवाई, और बाद में अपने अन्य शिष्यों को भी सिखाई। इसी तरह धीरे-धीरे यह कथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी फैलती गई और आज तक जीवित है।
एक प्रचलित कथा के अनुसार, राजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय ने एक भव्य यज्ञ आयोजित किया था। इस यज्ञ में सूतजी नाम के एक विद्वान पुराणज्ञ उपस्थित थे, जिन्होंने वहां मौजूद ऋषियों की सभा में महाभारत की पूरी कथा सुनाई। इस सभा के मुखिया महर्षि शौनक थे।
महाभारत क्यों खास है-महाभारत सिर्फ एक युद्ध की कहानी नहीं है — यह मानव स्वभाव, रिश्तों, सत्ता के लालच, धर्म और अधर्म के बीच के द्वंद्व को दर्शाने वाला महाकाव्य है। इसे विश्व के सबसे लंबे महाकाव्यों में गिना जाता है, जिसमें एक लाख से भी ज्यादा श्लोक हैं। इसीलिए कहा जाता है — "जो महाभारत में नहीं, वह कहीं नहीं।"
हस्तिनापुर का राजवंश-कथा की शुरुआत होती है महाराज शांतनु से। उनके बाद उनके पुत्र चित्रांगद हस्तिनापुर के राजा बने, लेकिन उनकी असमय मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके छोटे भाई विचित्रवीर्य गद्दी पर बैठे। विचित्रवीर्य के दो पुत्र हुए धृतराष्ट्र और पांडु। धृतराष्ट्र बड़े थे, लेकिन जन्म से नेत्रहीन होने के कारण उस समय की परंपरा के अनुसार राजगद्दी छोटे भाई पांडु को सौंपी गई। पांडु ने लंबे समय तक शासन किया। उनकी दो पत्नियां थीं — कुंती और माद्री।
वनवास और पांडवों का जन्म-एक समय पांडु किसी भूल के प्रायश्चित स्वरूप वन में तपस्या करने चले गए। उनकी दोनों पत्नियां भी उनके साथ गईं। इसी वनवास के दौरान कुंती और माद्री ने पांच पुत्रों को जन्म दिया, जो आगे चलकर "पांडव" कहलाए। कुछ समय बाद पांडु का निधन हो गया, और अनाथ हो चुके इन पांचों बालकों का पालन-पोषण वन में रहने वाले ऋषि-मुनियों ने किया। उन्होंने ही इन बच्चों को शिक्षा-दीक्षा दी।
जब सबसे बड़े पांडव युधिष्ठिर सोलह वर्ष के हुए, तब ऋषियों ने पांचों भाइयों को हस्तिनापुर लाकर उनके दादा पितामह भीष्म को सौंप दिया। पांडव बुद्धि में तीव्र, शरीर से बलशाली और स्वभाव से मधुर थे, जिस कारण जल्द ही सबका स्नेह पाने लगे।
पांडवों की लोकप्रियता देखकर धृतराष्ट्र के पुत्र — जिन्हें "कौरव" कहा जाता है, और जिनकी संख्या सौ बताई जाती है, सबसे बड़ा दुर्योधन — ईर्ष्या करने लगे और पांडवों को नाना प्रकार से सताने लगे। कहा जाता है कि दुर्योधन ने कई बार पांडवों की जान लेने की कोशिश भी की, जैसे लाक्षागृह (लाख से बने महल) में उन्हें जलाकर मारने की साजिश। लेकिन हर बार पांडव किसी न किसी तरह बच निकले।
इसी दौरान दोनों कुल के राजकुमारों को शिक्षा देने के लिए गुरु द्रोणाचार्य नियुक्त हुए, जिन्होंने कौरवों और पांडवों दोनों को अस्त्र-शस्त्र विद्या सिखाई। अर्जुन धनुर्विद्या में सबसे निपुण निकले, वहीं भीम बल में और युधिष्ठिर धर्म व नीति में श्रेष्ठ माने गए।
आगे चलकर द्रौपदी के स्वयंवर में अर्जुन ने कठिन धनुर्विद्या प्रतियोगिता जीतकर द्रौपदी से विवाह किया। एक विशेष परिस्थिति के कारण द्रौपदी पांचों पांडवों की सामूहिक पत्नी बनीं। समय के साथ दोनों पक्षों के बीच शत्रुता गहराती गई। अंततः पितामह भीष्म ने हस्तक्षेप कर दोनों पक्षों में समझौता कराया। उनके निर्देश पर राज्य का विभाजन कर दिया गया — कौरव हस्तिनापुर में शासन करते रहे, जबकि पांडवों को एक नया राज्य दिया गया, जो आगे चलकर इंद्रप्रस्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। पांडवों ने अपनी नई राजधानी को बड़ी मेहनत से एक भव्य नगरी में बदल दिया, जिसकी शोभा देखकर कौरव और भी जलने लगे।
उस युग में राजाओं के बीच चौसर (एक पासों का खेल, जिसे आज के लूडो जैसा समझा जा सकता है, पर आकार में कहीं बड़ा) खेलने की प्रथा थी, जिसमें कई बार पूरे राज्य तक की बाज़ी लगा दी जाती थी। इसी परंपरा के तहत एक दिन कौरवों और पांडवों के बीच चौसर का खेल हुआ। कौरवों की ओर से खेलने वाले छलिया शकुनी ने चालाकी से युधिष्ठिर को हरा दिया। युधिष्ठिर एक-एक कर अपना धन, राज्य, भाई और अंत में स्वयं को भी दांव पर लगाकर हार गए। सबसे दुखद क्षण तब आया जब उन्होंने द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया और हार गए। इसके बाद दुर्योधन के भाई दुःशासन ने सभा में द्रौपदी का सरेआम अपमान करने की कोशिश की, जिस घटना ने आगे चलकर युद्ध की नींव और मजबूत कर दी। इस अपमान के परिणामस्वरूप पांडवों को अपना राज्य गंवाना पड़ा।
शर्त के अनुसार पांडवों को तेरह वर्षों का वनवास भोगना पड़ा — इनमें बारह वर्ष खुले वनवास के थे, और अंतिम एक वर्ष अज्ञातवास का, यानी इस तरह छिपकर रहना कि कोई उन्हें पहचान न सके। शर्त यह भी थी कि यह अवधि पूरी होने पर उनका राज्य उन्हें लौटा दिया जाएगा।
द्रौपदी सहित पांचों पांडवों ने पूरे तेरह वर्ष वन और अज्ञातवास में बिताए। लेकिन अवधि पूरी होने के बाद भी लालची दुर्योधन ने राज्य लौटाने से इनकार कर दिया।
कुरुक्षेत्र का युद्ध-राज्य वापस न मिलने पर पांडवों को अपने अधिकार के लिए युद्ध करना पड़ा। यह युद्ध कुरुक्षेत्र के मैदान में हुआ और पूरे अठारह दिनों तक चला। युद्ध शुरू होने से ठीक पहले अर्जुन अपने ही स्वजनों के विरुद्ध शस्त्र उठाने से हिचकिचा गए। तभी उनके सारथी बने भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्तव्य और धर्म का उपदेश दिया, जो आगे चलकर "भगवद्गीता" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
युद्ध में दोनों पक्षों के बड़े-बड़े योद्धा शामिल हुए — पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, अभिमन्यु जैसे महारथी इसी युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। कर्ण, जो वास्तव में कुंती के सबसे बड़े पुत्र और पांडवों के बड़े भाई थे पर पालन-पोषण अलग हुआ, दुर्योधन के परम मित्र और सबसे बड़े सहारे के रूप में युद्ध में उतरे। अंततः अर्जुन के हाथों कर्ण भी मारे गए।
अठारह दिनों के इस भीषण युद्ध में समस्त कौरव मारे गए, और अंततः पांडव उस विशाल साम्राज्य के स्वामी बने। इस विजय में पांडवों को अपने ही परिवार को खोने का गहरा दुख भी सहना पड़ा।
राज्याभिषेक और अंतिम यात्रा-युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने और धृतराष्ट्र को भी सम्मान सहित राजमहल में स्थान दिया गया। इसके बाद पांडवों ने लगभग छत्तीस वर्षों तक न्यायपूर्वक राज्य किया, जिसमें प्रजा ने खूब सुख-समृद्धि देखी। अंत में अपने पौत्र परीक्षित को राजपाट सौंपकर वे द्रौपदी सहित तपस्या के लिए वन की ओर चले गए, जो उनकी सांसारिक जीवन की अंतिम यात्रा थी।
यही है महाभारत की कथा का सार — सत्ता, ईर्ष्या, धर्म और कर्तव्य के बीच झूलता एक ऐसा आख्यान, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हज़ारों वर्ष पहले था।